हम सचमुच जीवन -मरण के दोराहें पर खड़े हैं । जीवन इस असमंजस में घिरा है की हमारा क्या होना है । हमारा अस्तित्व अगले दिनों रहना है या उसकी इतिश्री होने ही घड़ी आ गई । जिस रह पर व्यक्ति और समाज ने चलने की ठान ठानी है , वह अत्यन्त भयावह है । हर क्षेत्र की हर स्थिति उलझती चली जा रही है और गतिरोध ने आगे बढ़ने का रासता बंद कर दिया है ।
समय की इस विषम वेला में जागरूक आत्माओं का विशेष कर्तव्य है । युग निर्माण परिवार को इस आपत्ति- काल में जागरूक प्राणियों का विशेष कर्तव्य है । युग निर्माण परिवार को इस आपत्ति - काल में अपनी विशेष भूमिका निभाने है । उसे सामान्य नर - कीटकों की तरह पेट - प्रजनन के लिए नहीं जीना है । हमें अपनी विशिष्ट स्थिति का अनुभव बार -बार करना चाहिए । ऊँचा उठाकर सोचना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए , जिससे ऊँचे आदर्शों का निर्वाह होता हो । युग की उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में हमें कुछ तो करना ही होगा । अपनी जागरूकता का परिचय दी बिना अब कम चलेगा नहीं ।
१। सम्मान की पूंजी देने पर मिलती, बाँटने पर बढ़ती और बटोरने पर समाप्त हो जाती है ।
२। आप प्रतिदिन अपनी अंतरात्मा से पूछें की जो हम कर सकते थे, उसमें कहीं राइ - रत्ती त्रुटी तो नही रही? आलस्य प्रमाद को कहीं चुपके से आपके क्रिया - कलापों में घुस पड़ने का अवसर तो नही मिल गया ।